॥ कालः कलयतामहम् ॥

ज्योतिष-विद्या के शाश्वत ज्ञान का उद्घाटन

परम्पराप्राप्त भारतीय ज्योतिष एवं आध्यात्मिक चिन्तन का प्रामाणिक सङ्ग्रह।

ज्योतिष के सम्बन्ध में कुछ सदा-स्मरणीय महत्त्वपूर्ण बिन्दु

वेदचक्षु के रूप में ज्योतिष एक वेदाङ्ग है।

वेद ऋषिगण द्वारा प्रथम दृष्ट होते हैं।

संसार में वेद-वेदाङ्ग के अन्तिम प्रमाण ऋषिवाक्य मात्र हैं।

गणित ज्योतिष के लिये स्वयं भगवान् सूर्य द्वारा मयासुर को प्रदत्त श्रीसूर्यसिद्धान्त प्रधान है।

महर्षि पराशर फलित ज्योतिष के लिये अन्तिम प्रमाण हैं।

कलियुग में कोई ऋषि नहीं होता, अतः किसी के भी द्वारा कहे गए ज्योतिषीय सिद्धान्त, सूत्र अथवा नियम मात्र तभी मानने योग्य हैं, जब वे महर्षि पराशर के सिद्धान्त, सूत्र अथवा नियम के अनुकूल हों। अन्यथा की स्थिति में तुक्का भले ही बैठ जाए, परन्तु वह पूर्णतः अप्रामाणिक है; अतः कदापि अनुकरणीय नहीं।

ज्योतिष की परिभाषा “कर्म-विपाक-फल-काल-विधानम्” है। कर्मफल को समाप्त करने के लिए फलभोग तथा तपस्या द्वारा कर्म को दग्धबीज करने के अतिरिक्त अन्य विकल्प नहीं।

ज्योतिष का संक्षेपीकरण (Shortcut) ज्योतिष को नष्ट करने का प्रयास है। कोई भी ज्योतिषी, ज्योतिषीय पोस्ट, ज्योतिषीय सूत्र, कारण अथवा उपाय आदि इस कसौटी पर कसे जाने चाहिए।

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