आगामी पर्व / विशेष विचार
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पञ्चाङ्ग के आधार (संक्षिप्त सूचना)
पञ्चाङ्ग दो शब्दों-“पञ्च” व “अङ्ग” से मिलकर बना है। अतः इसमें मुख्यतः पाँच अङ्गों-वार, तिथि, नक्षत्र, करण व योग का समावेश होता है।
पञ्चाङ्ग-निर्माण का आधार स्थानीय सूर्योदय होता है, जो स्थानानुसार भिन्न होता है; इसलिये पूरे भारत के लिये कोई एक पञ्चाङ्ग लागू नहीं किया जा सकता। यहाँ प्रदर्शित श्रीसूर्यसिद्धान्तीय पञ्चाङ्ग भी स्थानीय सूर्योदय-आधारित है। अतः शुद्ध पञ्चाङ्ग देखने के लिये उपयोगकर्ता को अपने निकटतम स्थान का चयन करना चाहिये।
श्रीसूर्यसिद्धान्तीय व दृक्पक्षीय पञ्चाङ्ग में अन्तर
जिस प्रकार प्लेनेटोरियम में ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, आकाशगंगा आदि के कृत्रिम प्रतिरूप दिखाये जाते हैं, जबकि उनका वास्तविक अस्तित्व अन्यत्र होता है; उसी प्रकार भूलोक के पाञ्चभौतिक ग्रहपिण्ड ज्योतिषीय ग्रहदेवताओं के प्रतिनिधि हैं। ग्रहदेवता भुवर्लोक में रहते हैं और जीवों के कर्मफल देने की शक्ति उन्हीं में होती है, भौतिक ग्रहपिण्डों में नहीं।
आधुनिक दूरबीनों से भौतिक ग्रहपिण्ड देखे जा सकते हैं, ज्योतिषीय नवग्रह नहीं। खगोलीय कार्यों के लिये Astronomical गणना तथा ज्योतिषीय फल-विचार के लिये Astrological गणना का अपना पृथक् प्रयोजन है।
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॥ॐ कालात्मने नमः॥
भारतीय काल गणना के आधार
और संवत् २०८३ का वासन्तीय नवरात्र
१. भारतीय नववर्ष और वासन्तीय नवरात्र
भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है, परन्तु इस वर्ष प्रतिपदा का क्षय होने के कारण नववर्ष चैत्र शुक्लपक्ष द्वितीया तदनुसार अंग्रेज़ी कैलेण्डर के अनुसार २० मार्च २०२६, शुक्रवार को इस नववर्ष का आरम्भ हो रहा है।
२. भारतीय कालमान के नौ प्रकार
समय की गणना के लिए ज्योतिष में ९ प्रकार के कालमान (गणना की विधियों) की चर्चा है।
सौरं च सावनं चान्द्रमार्क्ष्यं मानानि वै नव॥
ब्राह्मकाल (ब्राह्मवर्ष), दिव्यवर्ष (देवताओं का वर्ष), पैत्र्य (पितरों का) वर्ष, प्राजापत्य (मन्वादि) वर्ष, गौरव (बार्हस्पत्य) वर्ष, सौरवर्ष, सावन वर्ष, चान्द्र और नाक्षत्र वर्ष - ये नौ प्रकार के कालमान कहे गए हैं।
इन नौ प्रकार के कालमान में मनुष्यों के प्रयोग में आने वाले केवल चार - सौरमान, सावनमान, चान्द्रमान और नाक्षत्रमान - ही होते हैं। बार्हस्पत्य काल दैनिक उपयोग में नहीं आता बल्कि इसका उपयोग षष्ट्यब्द ज्ञान के लिए होता है। इसी प्रकार ब्राह्म मान ब्रह्मा जी की आयु की गणना करने के काम आता है, दिव्यवर्ष से देवताओं के वर्षों की गणना होती है और प्राजापत्य वर्ष भी मानवेतर गणना में उपयोगी होता है।
३. मनुष्यों के व्यवहार में प्रयुक्त चार कालमान
| कालमान | मुख्य उपयोग |
|---|---|
| सौरमान | वर्ष, अयन और ऋतु आदि की गणना |
| चान्द्रमान | मास और तिथि की गणना |
| सावनमान | व्रत, उपवास, संस्कार आदि कर्मों की गणना |
| नाक्षत्रमान | घटी-पल आदि का विचार |
४. सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन दिन
जितने समय में सूर्य एक अंश चलते हैं वह एक सौर दिन कहा जाता है, सूर्य और चन्द्रमा के बीच १२ अंश की कोणीय दूरी को एक तिथि कहते हैं और इस मान को एक चान्द्र दिन कहते हैं।
एक नक्षत्र के आरम्भ से उसकी समाप्ति तक का समय एक नाक्षत्र दिन कहा जाता है और एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय के मान को एक सावन दिन कहते हैं। रविवार, सोमवार आदि की गणना सावन मान के अन्तर्गत आती है।
५. वारप्रवृत्ति का शास्त्रीय नियम
६. विभिन्न कालमानों का प्रयोग
वर्ष, अयन, ऋतु आदि की गणना सौरमान से, मास और तिथि की गणना चान्द्रमान से, व्रत, उपवास, संस्कार आदि कर्मों के लिए गणना सावन मान से और घटी-पल आदि का विचार नाक्षत्र मान से करना चाहिये।
यत् कृच्छ्रसूतकचिकित्सितवासराद्यं तत्सावनाच्च घटिकादिकमार्क्षमानात्॥
७. देवताओं और असुरों का दिन-रात्रि
मकर राशि से लेकर मिथुन राशि तक सूर्य के रहने को देवताओं का दिन कहते हैं, और इसे ही सौम्यायन भी कहते हैं। इसी प्रकार कर्क से लेकर धनु राशि तक सूर्य के रहने पर असुरों का दिन होता है, जो याम्यायन कहा जाता है।
देवताओं का दिन असुरों की रात्रि होती है, इसी प्रकार असुरों का दिन देवताओं की रात्रि कही जाती है और ये छह-छह महीनों के होते हैं। देवताओं और असुरों के इस दिन-रात्रि को मिलाकर एक दिव्य दिन होता है, जिससे दिव्य वर्ष की गणना होती है। इस प्रकार मानवों के ३६० वर्ष देवताओं (और असुरों का भी) एक वर्ष होता है।
मेषसंक्रान्ति (जो आजकल सामान्यतः १३ से १५ अप्रैल के मध्य पड़ती है) देवताओं का मध्यदिवस होती है। मकर संक्रान्ति आजकल १४-१५ जनवरी को होती है और कर्क संक्रान्ति १५-१६ जुलाई के आसपास होती है।
८. षष्ट्यब्द संवत्सर और “रौद्र” संवत्सर
प्रभावादि कुल ६० संवत्सर होते हैं, जिनकी गणना बृहस्पति से की जाती है। इस वर्ष श्रीसूर्यसिद्धान्तीय गणना से स्पष्ट बार्हस्पत्य मान के अनुसार वर्षपर्यन्त संकल्प आदि में “रौद्र” नामक संवत्सर का प्रयोग होगा।